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रूस-यूक्रेन युद्ध: “ऑपरेशन गंगा” हिट या मिस

by Admin Desk
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लेखक: आत्मजीत सिंह
राष्ट्रीय समन्वयक भारतीय किसान संघ (ASLI)

भारत सरकार युद्धग्रस्त देश से छात्रों की निकासी को एक विशाल जनसंपर्क अभ्यास में बदल रही है, और छात्रों को विदेशों में पढ़ने के लिए दोषी ठहरा रही है। सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि उन्होंने रूसी सैन्य आक्रमण के खिलाफ एक शब्द भी नहीं कहा।

यूक्रेन पर पुतिन का युद्ध अपने अगले चरण में प्रवेश कर गया है, जो नागरिकों के विनाश के लिए ज़िम्मेदार है। भारतीय उड्डयन मंत्रालय का कहना है कि लगभग 3,500 भारतीयों के साथ 17 उड़ानें शुक्रवार को भारत आने की उम्मीद है। यूक्रेन में युद्ध चल रहा है और प्रधानमंत्री मोदी जी बनारस में इलेक्शन मीटिंग कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्य मंत्री ममता बनर्जी ने एक रैली में कहा की “अगर आपके पुतिन के साथ इतने अच्छे संबंध हैं तो आपको तो पहले से ही पता था कि युद्ध होने वाला है तब ही आप भारतीय छात्रों को क्यों नहीं लेकर आए?”

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यूक्रेन के खार्किव में भारतीय छात्र का एक वीडियो वाइरल हुआ है जिसने उसने यह कहा है कि, “मैं ट्रेन में प्रवेश करने की कोशिश कर रहा हूँ। हम यहां खोलोदना में हैं। मदद की प्रतीक्षा में पर हमें ट्रेन पर खरकीव से लीव, रोमानिया जाने नहीं दिया जा रहा है।” एक छात्र ने कैंपस में हुए विस्फोट का वीडियो शेयर किया जिसमें यूक्रेन के सुमी विश्वविद्यालय में फंसे 400 से अधिक भारतीय छात्रों ने आरोप लगाया है कि युद्ध शुरू होने के बाद से कोई मदद नहीं मिली है। एक और वीडियो में विन्नित्सिया विश्वविद्यालय के एक भारतीय छात्र ने रोमानिया-यूक्रेन सीमा से वीडियो भेजा है। उसका कहना है रोमानिया में प्रवेश करने के लिए छात्रों ने 36 घंटे तक कतार में इंतजार किया।

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खार्किव के पास पिसोचिन के एक आश्रय में लगभग 700-800 भारतीय छात्र हैं। उनके पास कोई कंबल नहीं है और लगभग कोई भोजन नहीं है। भारतीय दूतावास की चेतावनी के बाद वे कल वहां पहुँचे थे। वर्तमान में भारतीय अधिकारियों से कोई मदद नहीं मिली है की उन्हें अब क्या करना चाहिए? एक ट्वीट के ज़रिए भारतीय दूतावास ने सभी भारतीय नागरिक जो पिसोचिन को छोड़कर खार्किव में हैं, को तत्काल आधार पर रेजिस्ट्रेशन फॉर्म भरने के लिए कहा है।

विदेश मंत्रालय का कहना है की पिछले 24 घंटों के दौरान भारत में पंद्रह उड़ानें उतारी गयी और 3,000 से अधिक भारतीयों को सुरक्षित वापस लाया गया है। सचाई यह है अधिकांश देशों के नागरिक युद्ध से पहले ही यूक्रेन छोड़ चुके थे क्योंकि उनके दूतावास ने समय पर दिशा-निर्देश दिए। एक छात्रा ने TV इंटर्व्यू के ज़रिए कहा कि भारतीय दूतावास से उन्हें कोई मदद नहीं मिली और अपनी जान हथेली पर रखकर वह बॉर्डर पहुँचे, और रोमानिया से ही उन्हें फ़्लाइट की सुविधा मिली। उसका कहना था, “पलायन एक सरकार का कर्तव्य है, एहसान नहीं”

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