Home राजनीति विपक्ष और सत्तापक्ष एक दूसरे के पूरक हैं

विपक्ष और सत्तापक्ष एक दूसरे के पूरक हैं

by Admin Desk
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किसी भी लोकतन्त्र को मजबूत करने के लिए एक विवेकी और सह्रदयी विपक्ष का होना बहुत ही जरुरी होता है | आज विपक्ष सिर्फ विरोध के लिए विरोध करता है | सरकार की नीतियों को सही गलत के तराजू में तौलकर अपनी राय देना विपक्ष का काम है, ना कि शोर शराबा करके संसद को हर बार दंगल बनाकर अपना शक्ति का प्रदर्शन करे | जो विपक्ष में हैं उनके पास भी विवेक होता है, विचार होते  हैं तथा सही मूल्यांकन क्षमता होती है |

सत्ता पक्ष में बैठे लोगों को भी विपक्ष में बैठे लोगों की बातों को गौर से सुनकर देश हित और जनहित में ही निर्णय लेने चाहिए | इसीलिये तो विपक्ष के नेता को एक संवैधानिक व्यक्ति का गरिमामय पद प्रदान किया जाता है | पर आज हमारे नेताओं ने सारे मूल्य , सारी परम्पराएँ तथा सारे आदर्श खो दिए हैं | आज सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच सांप नेवले जैसे सम्बन्ध दिखाई देते हैं देश हित जनहित न देखकर – सब पार्टी हित और स्वहित में ही व्यस्त दिखाई देते हैं |

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आज के नेता स्वार्थी और मतलब परस्त हो गए हैं | जब कोई बिल इन नेताओं के सम्बन्ध में आता है तो सारे दल एक हो जाते हैं, कोई भी बिल की कमियों को उजागर नहीं करता है | जो आज सत्ता में  हैं, कल वह विपक्ष में होगा, इसलिए एक दूसरे को सतुष्ट करना इनका काम रह गया है |
बहुत शोचनीय है कि आज संवैधानिक पदों में बैठे लोग एक विशेष पार्टी का प्रचार करने में सारी मर्यादाएं समाप्त कर देते हैं | कोई भी जब प्रधानमंत्री मुख्यमंत्री या मंत्री बन जाता है तो वह पूरे  राष्ट्र का, पुरी जनता का और पुरे देश या प्रदेश का संरक्षक होता है |

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ऐसे जब वह चुनाव प्रचार के समय निकलता है तो वह सिर्फ चुनाव जीतने के लिए अपनी सम्बध्द पार्टी का प्रचार करता है | बल्कि यह कहना ज्यादा उचित है कि वह पुरे कार्यकाल में सिर्फ और सिर्फ अपनी पार्टी का ही विकास करता है | हमारे संविधान में स्पष्ट रूप से इस पर नियम होना चाहिए | दूसरा सरकार द्वारा किये गए कार्यों और सुविधाओं को जनता के सामने इस तरह पेश करता है जैसे उन्होंने अपनी जेब से किया है | या उनकी पार्टी ने यह कार्य किया है | इस पर रोक लगनी चाहिए | पार्टी का प्रचार करने में सिर्फ उस पार्टी के अध्यक्ष तथा अन्य कार्यकर्ताओं को ही लगना चाहिए | मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री जैसे गरिमामय पद की गरिमा को इस तरह दर-दर वोट माँग कर नष्ट नहीं करना चाहिए | इसे राष्ट्रपति,और राज्यपाल की तरह किसी भी पार्टी के प्रचार में लिप्त नहीं होना चाहिए |

आज संसद की कार्यवाही , चुनावों के द्रश्य, एक दूसरे पर लगने वाले आरोप प्रत्यारोप स्वार्थ के आगे बौने हो जाते हैं , ऐसे नेताओं से हम कैसे एक स्वस्थ लोकतन्त्र की उम्मीद कर सकते हैं | सामाजिक भाषणों और संसद में जब इनकी भाषा इतनी निम्न स्तर की होती है तो इन नेताओं के मूल्य और संस्कार कैसे होंगें, इसका अनुमान आप स्वयंम लगा सकते हैं | भाषणों में चाहे कितनी आदर्श की बातें कर लें पर अन्तत: सब सत्ता के पीछे ही भागते हैं |

लेखिका: डॉ करुणा पाण्डेय

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